बुधवार, 25 मार्च 2020

जय जय कोड्याई: गाँव के एक नोकरी पैसा आदमी की जिन्दगी

जय जय कोड्याई: 
गाँव के एक नोकरी पैसा आदमी की जिन्दगी:   
       यू तो नोकरी करने वाला आदमी समझदार सुलझा हुआ चिंता मुक्त माना जाता है पर क्या यह सही है ?नहीं वह थोडा समझदार तो है किन्तु सुलझा हुआ और चिंता मुक्त नहीं है आओ एक नोकरी पैसा आदमी के बचपन से चलते है
अभी अभी छोटा बच्चा 3 साल का हुआ है उसके माँ बाप ने पड़ोस के बच्चो के साथ एक सलेट देकर उसे भी फ्री में पढने भेज दिया ताकि वह भी स्कूल में बेठना सीख जाये यदि किसी दिन बच्चे का मन स्कूल जाने का नहीं हुआ तो बेचारे के ऊपर थर्ड डिग्री अपनायी जाती है और कहा जाता तू नहीं पढ़ेगा तो क्या तेरा बाप पढ़ेगा बच्चा रोते हुए स्कूल जाता है और वहा भी उसका फूलमाला से स्वागत थोड़ी होता है मास्टर जी भी उस पर अपना हाथ साफ करते है वह छोटा बच्चा डर के मारे रोज स्कूल जाने लगता है| माँ बाप बहुत खुश होते है और फ्री में पढ़ रहे अपने बच्चे का दाखिला करवा देते है बच्चा भी खुश होता है क्योकि उसे नये कपडे नया बेग जो मिला है वह भी रात की ठंडी रोटी बिना नहाये अपने आप खाकर स्कूल जाता है 2-4 दिन तो सब ठीक ठाक चलता है किन्तु फिर बच्चे का मन स्कूल जाने का नहीं होता और वह खेलने लग जाता है उसकी माँ खेत से आती है तो उसे मास्टर जी के भेजे चेले बताते है की आज तेरा लड़का पढ़ने नहीं गया और हम उसे पकडे आये है यह सुन माँ का चहरा बिल्कुल लाल हो जाता है और वह भी चेलो की मदद के लिए साथ हो लेती है छोटा बच्चा अपने दोस्त के साथ अंटिया खेल रहा होता है उसकी माँ उसे देख जोर जोर से गाली देने लगती है और एक मुजरिम की तरह चेलो को सोप देती है और कहती है कह देना मास्टर से इसे खूब मारे मेरी तो यह मानता नहीं बच्चा खूब रोता है हाथ जोड़ता है अपनी माँ के और कहता है –माँ मुझे इन चेलो के साथ मत भेज मास्टर जी मारेगे पर माँ एक नहीं सुनती क्योकि उसे अपने बेटे को नोकरी जो लगाना है चेले बच्चे के हाथ पैर पकड़ कर मास्टर जी के सामने ले जाते है मास्टर जी भी अपने घर का घुस्सा उस बच्चे पर उतार देते है बच्चा थोड़ी देर रोने के बाद चुप हो जाता है|शाम तक बच्चा सब भुल जाता है और अपने दोस्तों के साथ मस्ती करने चला जाता है इस मस्ती में उसका पडोसी के बच्चे के साथ झगडा हो जाता है इस बात की शिकायत उसकी माँ के पास पहुच जाती है रात को माँ उस बच्चे को कोसते हुए कहती है तेने मेरी नाक में दम कर रखा है तुझे तो किसी होस्टल में ही रखना पड़ेगा बच्चा चिन्ता में आ जाता है|
अगली जुलाई में बच्चा 3 री क्लास में पहुच जाता है बच्चे की माँ उसके बापू से कहती इस लड़के को  बहार किसी हॉस्टल में रखो बापू कहता है अभी तो यह बच्चा है इसके खेलने खाने के दिन है इसका बचपन खत्म मत करो पर माँ एक नहीं सुनती कहती है यह यहाँ रहेगा तो पढेगा नहीं रोज मस्ती करेगा ओर बिगड़ जायेगा फिर नोकरी केसे लगेगा माँ की बाते सुन बापू बच्चे को शहर में पढ़ाने के तेयार हो जाते है और पहले से शहर के कॉलेज में पढ़ रहे अपने भाई के लड़के के साथ रखने का फेसला कर लेते  है बच्चा जेसे ही यह फेसला सुनता है थोडा खुश होता है चलो अब तो शहर में रहेंगे खुब मजे करेंगे लेकिन जब वह अपना गाँव छोड़ता है तो अपने दोस्तों को अलबिदा कहने जाता है अपनी माँ से मिलने जाता है अपने घर अपने परिवार से मिलता है अपने भाई बहिन से मिलता है अपनी हर उस चीज को देखता है जिससे उसका नाता था और वह बच्चा अकेले में रोने लगता है क्योकि उसे लगता है यदि मेने आज अपना गाँव छोड़ दिया तो शायद मै यहाँ अपने मरने के बाद भी नहीं आ पाउँगा मेरी सारी दुनिया उजड़ जायेगी मेरे दोस्त छुट जायेंगे मेरी माँ बापू छुट जायेंगे जिनके बिना में एक दिन भी नहीं रहा मेरे अपने छुट जायेंगे और यह सब सोच बच्चा शहर जाने का प्लान बदल देता है पर उसके माँ बापू एक नहीं सुनते और बच्चे को रोता हुआ जबरदस्ती शहर भेज देते है साथ साथ लुगड़ी के अन्दर माँ भी खुब रोती है पर अपने बच्चे के अच्छे भबिष्य के लिए रोती रहती है और अपने जिगर के टुकड़े के जाने देती है|लड़का बस में बेठ जाता है और अपने मन को समझाते हुए शहर में आने वाले आनंद के बारे में सोचता है रोड के दोनों तरफ के गाँव देखता रहता है जिससे उसे अपने गाँव जेसा माहोल लगता है आखिर बच्चा शहर पहुच जाता है वह बड़े ध्यान से शहर को देखता है वहा के लोगो को देखता है शायद कोई अपना या अपने जेसा मिल जाये| 2-3 दिन तो कपडे सिलाने सामान खरीदने में निकल जाते है उसके बाद स्कूल में दाखिला करवा दिया जाता है |आज बच्चे का स्कूल में पहला दिन है सुबह जल्दी उठता है अपने आप नहाता है अपने कपडे खुद धोता है और स्कूल के लिए अपने आप तेयार हो जाता है नाश्ते में रात की बची ठंडी रोटी चाय के साथ खा कर स्कूल के लिए निकल जाता है उसे कोई छोड़ने नहीं जाता अब वह समझ जाता है की अब आगे का रास्ता मुझे अकेले ही तय करना है|स्कूल पहुचने के बाद वह सहमा हुआ चारो और देखता है अब नयी दिक्कत उसके सामने आती है वह हिंदी में बात करना नहीं जानता क्लास के लड़के उसकी मजाक उड़ाते है जेसे तेसे वह दिन निकलता है और वह वापस अपने कमरे पर आ जाता है यहाँ कोई उससे नहीं पूछता तेरा स्कूल का पहला दिन केसा रहा स्कूल से आकर 10 बजे बनी ठंडी दाल रोटी खाता है सारे बर्तन साफ करने का हुकम मिलता है लड़का अपने छोटे हाथो से बर्तन साफ कर देता है अब उसे खेलने के लिए कोई साथी नहीं मिलता शाम के समय वह उदास हो जाता है और मकान की छत पर अपने गाँव की तरफ मुँह कर बेठ जाता है|रात के खाने में मदद करते हुए कई बार गर्म तबे पर हाथ जल जाता है  पर उसका दर्द समझने वाली माँ भी उसके पास नहीं है रात को अपने घरवालो को याद करते हुए उसे नींद आ जाती है|धीरे-धीरे कुछ अपने जेसे गाँव के लडको के साथ उसकी दोस्ती होती है और वह उसे थोड़ी राहत मिलती है और वह अपने दोस्तों के साथ अपनी जिन्दगी को आगे बढाता है| अब वह पहली बार अपने गाँव जाने के बारे में सोचने लगता है और दिन गिनता है फिर वो दिन आ जाता है जब उसे गाँव जाना है वह अपने कपड़ो की प्रेस किसी से मांग कर करता है अपने स्कूल के जूते पहन थेली में अपने सामान घी की बाल्टी रख कर बस स्टेण्ड की और चल देता है आज तो ख़ुशी के मारे उसे भूख भी नहीं लग रही है|अपने गाँव जाने वाली बस में खिड़की वाली सीट पर बेठ जाता है और सारे राश्ते बहार का नजारा देखते हुए खुश होता की चलो इस जेल से राहत तो मिली अब तो वह बस जल्दी से अपने घर पहुचना चाहता है|घर पहुच कर सबसे पहले अपनी माँ से मिलता है जो अपने लाल का बेसब्री से इंतजार कर रही है अपने बेटे को देखकर माँ की आखे नम हो जाती है और कहती है मेरा बेटा कितना कमजोर हो गया|लड़का  अपने दोस्तों के साथ खूब मस्ती करता है और उसे पता ही नहीं चलता कब शहर बापस जाने का दिन पास आ जाता है उस रात वह सो भी नहीं पता क्योकि उसे कल जाना है|सुबह से वह उदास रहता और इस उम्मीद में गाँव के स्टेण्ड पर जाता है की काश आज बस नहीं आये और मुझे एक दिन और मिले किन्तु ऐसे समय तो किस्मत भी साथ नहीं देती और वह बेमन से बस में बेठ जाता है और जब तक अपने गाँव को देखता है तब तक की बस दूर नहीं चली जाती|अपनी आखों में आसू लिए वह हिसाब लगाता है की अब कितने दिनों के बाद गाँव आना है|दुखी मन से कमरे पर पहुच जाता है और अपने साथियों के साथ गाँव की बाते करता है| अब वह शहर को अपना चूका है और उसको शहर की आवो हवा पसंद आने लगती है|अपने दोस्तों के साथ टाकीज में फिल्म देखने जाता है किन्तु बहुत डर के साथ की कही कोई जानकार ना मिल जाये और सबसे कम वाला टिकट लेकर फिल्म का मजा लेता है खूब घूमता फिरता है|पता ही नहीं चलता और वह 10 वी में पहुच जाता है और बहुत व्यस्त हो जाता है टयूशन आदि में और खुब मेहनत करता है ताकि वह आपना भबिष्य सुधार सके और 10 वी में वह ठीक ठाक नंबर से पास हो जाता है अब बारी आती है विषय चुनने की जिससे वह कुछ बन सके पर उसे अब भी अपने गाँव के सीनियर की राय पर ही अपना विषय चुनना पड़ता है|११ वी में प्रवेश मिलता है अब तो वह बिंदास है क्योकि वह बड़ा जो हो गया है|अब मनोरंजन के लिए सप्ताह के अंत में अपने दोस्तों के साथ वीडियो देखता है और खूब आनंद में रहता है अब वह जिम्मेदार भी हो गया है परिवार में अपनी जिम्मेदारी समझता है अपने आपको समाज के सामने रखता है समाज में उसे बहुत रूचि रहती है | जेसे तेसे वह 12 वी पास कर लेता है और कालेज में प्रवेश के लिए फार्म भरता है और उसको नियमित दाखिला मिल जाता है वह बहुत खुश है और अब वह अपने गाँव को कम याद करता है यह उसके जीवन का सबसे अच्छा  समय है और वह अपना दायरा बड़ा करता है अपनी पहचान बनाता है अपने दोस्तों के साथ उनके गाँव उनकी रिश्तेदारियो में जाता है और अपने हिसाब से अपनी जिन्दगी जीता है साथ ही कुछ उल्टी सीधी हरकते भी करने लगता है अब उसे यह पराया शहर अपना लगने लगता है अब वह अपने सपनो को पूरा करने में लग जाता है| कॉलेज के दिनों में वह सब किया जो जिन्दगी शायद कभी ना कर पाये|कॉलेज की मस्ती के साथ ही अब सारे ज़माने की निगाहे उसके ऊपर ही टिक जाती है कि बेटा तुम नोकरी कब लगोगे अपने परिवार के सारी आशा सारी उम्मीद भी अपने जिम्मेदार बेटे के ऊपर आकर रुक सी गयी है| अब लड़के के को समझ में आ गया की बेटे अब तो इस नोकरी के चक्कर में फस गए ज़माने के ताने उसकी चिंता और बड़ा देते है अपनी मस्ती भरी जिन्दगी को हमेशा के लिए अलबिदा कह कर प्रतियोगी परीक्षा की तेयारी में पूरी इमानदारी और मेहनत से लग जाता है|जेसे जेसे दिन गुजरते जाते है लड़के की चिंता और बढ़ जाती है लोग ताने मरते है क्या पता कब नोकरी लगेगा|लड़का रेल्बे की परीक्षा देने के लिए भारत के हर कोने में जाता है और बड़ी परेशानी उठाता है वासी रोटी खाता है भूखा रहता है ट्रेन में गंदगी में सो कर जाता है एक भी रूपया फालतू खर्च नहीं करता स्टेशन पर सोता है इन सब परेशानियों के बाद भी कोशिश करता है की परीक्षा का पेपर अच्छा हो जब वह परीक्षा देने जाता है तो कभी नहीं सोचता की वह अपने घर से इतनी दूर केसे रहेगा|खूब मेहनत के बाद भी कही पास नहीं होता तो वह चिंता में डूब जाता है और परीक्षा देता है और एक दिन वह दिन आ जाता है जिसका उसे व उसके घरवालो को इंतजार होता है उसकी नोकरी लग जाती है| नोकरी भी घर से बहुत दूर लगती है जहाँ उसका अपना कोई नहीं है जिसे वह पहले से जानता हो वह अनजान शहर मनो उसके धेर्य की परीक्षा ले रहा हो|उसे अपनों से दुरी का अहसास अब हुआ अब उसे लगने लगा की अब मेरा गाँव मेरे अपने मेरे से हमेशा के लिए छूट गये है समय के साथ वह अपने आप को नयी जगह पर स्थापित कर लेता है और अपने ऑफिस के काम में अपना मन लगाता है फिर वह दिन भी आ जाता है जब उसे अपनी मेहनत का सही फल अपनी पहली सैलरी के रूप में मिलता है वह अपनी जिन्दगी की पहली कमाई देखकर बहुत खुश होता है और अपने तथा अपने घरवालो के लिए सपने देखने लगता है और अपने परिवार की सारी परेशानी दूर करने के लिए अपने ऊपर बहुत कम खर्चा कर अधिक रूपए अपने घरवालो के लिए बचाना शुरू कर देता है|धीरे-धीरे घर की स्थिति ठीक हो जाती है और अब उसकी शादी की बात चलने लगती है उसके परिवार के पास यही एक मोका होता है अपने बच्चे पर खर्च किये पैसों का सही मोल-भाव करने का खूब सारे रिश्ते देखे जाते है और तब तक रिश्ता तय नहीं होता जब तक की सही मोल नहीं मिल जाता|फिर एक दिन रिश्ता पक्का हो जाता है जो पैसे शादी में आने वाले है उनके चक्कर में फिजूलखर्ची ज्यादा हो जाती है जिससे घर में शादी का एक भी रूपया नहीं बचता|
शादी के बाद उसके जीवन में ख़ुशी आती है किन्तु अधिक दिनों तक नहीं क्योकि शादी के बाद घरवालो को लगता है लड़का बदल गया है बहू कि बात अधिक सुनता है| हमारी कम| पर उन घरवालो को कोन समझाये कि मेरी अभी अभी शादी हुई है मुझे कुछ दिन तो अपने जीवनसाथी के साथ आराम से बिताने दो पर नहीं सभी परिवार के लोग मान लेते है अब यह हमारी नहीं सुनता इसी बात को लेकर परिवार में थोड़ी परेशानी शुरू हो जाती है उसे लगता है मैं बिना शादी ही ठीक था| कुछ दिनों बाद अपनी पत्नी को अपने साथ अपनी नोकरी वाली जगह लेकर जाने के लिए घरवालो से बात करता है किन्तु घर वाले कहते है यहाँ तो सुनता नहीं शहर में जाने के बाद तो हमारी बिल्कुल नहीं सुनेगा ना नहीं गाँव आयेगा| घरवालो को कौन समझाये की क्या टहनी पेड़ से अलग होकर खुश रह सकती है| 
आगे जारी है.........

बुधवार, 29 अगस्त 2018

सरकारी अधिकारी की मज़बूरी

मैं राजस्थान पंचायत राज के अधिकारी BDO से अपने गाँव की समस्याओं को लेकर मिला।औपचारिक वार्ता के बाद मुद्दे की बात हुई मेने काहा साहब मेरे गाँव में विकास नहीं हो रहा है जबकि सरकार खूब बजट दे रही है तो BDO साहब मज़बूरी में कहने लगे मुकेश जी नेताओ पर हमारा कोई नियंत्रण नहीं है और सचिवो की तो बात ही मत करो क्योकि 41 पंचायतों में 23 सचिव है कई के पास अतिरिक्त प्रभार है इसलिये ध्यान नहीं दे पाते।।